*पूर्वांचल का विख्यात बामन्त मां का मंदिर आस्था का वरदान*

*दौ सौ वर्षों से प्रचीन काल से मेले लगता है आयोजन*

बामन्त मां की महिमा से लाखों भक्तों की मुरादें होती है पूरी

सरहरी
जनपद गोरखपुर

मैनुद्दीन अली /भटहट से

 

(भटहट) गोरखपुर से 15 किमी दूर उत्तर दिशा मे टिकरिया रोड पर स्तिथ बांसस्थान बामन्त मां का मंदिर सदीयों पूराना है, जो आकर्षकता का केन्द्र है. वहां पर दो शताब्दी पूर्व ब्रिटिश शासन काल से ही चैत्र रामनवमी की सप्तमी से काफी बड़े स्तर पर मेले का आयोजन किया जाता है जिसकी तैयारी नवरात्र के पहले ही दिन से प्रारंभ हो जाती है पड़ोसी देश नेपाल सहित पड़ोसी राज्य बिहार तथा अन्य प्रदेशों से लाखों की बड़ी संख्या में भक्त गण मनोकामना पूर्ति के लिए शक्ति पीठ पर बामन्त मां के मंदिर पर पूजा अर्चना करने जाते है
शक्ति पीठ बामन्त मां की बहूचर्चित चमत्कारी गाथाये स्थानीय लोगों की जुबानी सुनने को मिलती है.और इस प्रकार का चमत्कार सुनने को मिलता है कि जब एक भैस चरवाहा अपने एक सुखी लाठी को उनके स्थान पर गाड़ दिया और कहा कि अगर इस माँ में शक्ति होगा तो इसको हर कर दे
जिसमें एक चमत्कार का किवदंती है जो की वर्षो से क्षेत्रीय लोगो मे चर्चा का केंद्र रही है  जो एक चरवाहे की कहानी पर आधारित है. वर्षो पहले स्थानीय निवासी गुनई यादव नामक एक चरवाहे की भैस  बास स्थान के पास चिलुआताल के जंगलों में खो गई थी. चरवाहा चारो तरफ अपनी भैसों को खोज कर थक गया थक हार कर माता के स्थान पर पहूंचा. (उस समय माता का सिर्फ एक पिंडी स्थापित था लोग जिसकी पूजा अर्चना करते थे ) मां से खोये हुए भैस प्राप्ती के लिए प्रार्थना किया और भैस मिलने पर इसे वह माता का चमत्कार समझेगा. ये बातें कहते हुऐ  चिलुआताल में अपनी प्यास बुझाने चला गया.  वापस आकर उसने देखा तो उसकी भैसे वापस आ चुकी थी. लेकिन  उसको माता  के चमत्कार पर विश्वास नही हुआ. और अपने भैसों के साथ घर चला गया।

“बामन्त माता की परिक्षा लेने पर चरवाहे ने अपना दम तोड़ा ”

दूसरे दिन पुनः वापस आकर मां की परिक्षा लेने की बात कहने लगा साथी चरवाहों ने बहुत समझाया लेकिन वह नादानी कर बैठा वर्षो पुरानी अपनी भैस चराने वाली लाठी को पिंडी के पास जमीन में गाड़ कर बोला माता अगर आप मे शक्ति है तो सूखे बांस की लाठी में कल तक कोपले निकल जायेगी इसमे से हरे भरे पत्ते निकल आएंगे अगले दिन चरवाहा माता के पिंडी वाले स्थान पर पहुचा तो सूखे बांस की लाठी से बास की कोपले निकल चुकी थीं गुनई चरवाहा मां के इस चमत्कार को सहन नही कर पाया भयभीत हो कर एक छड़ में दम तोड़ दिया.साथी चरवाहों ने लोगो से इस बात को बताया, तभी से शक्ति पीठ बामन्त के चमत्कार का चर्चा क्षेत्र में आग की तरह फैल गई। उसी क्षण से पिंडी वाले स्थान को बांसस्थान के नाम से पुकारा जाने लगा. और माता के पिंड को शक्तिपीठ के रूप में पूजा करना शुरु कर दिया

कुछ समय बाद अंग्रेजो के शासन काल मे उक्त जमीने भेलौजी स्टेट के अधीन थी कुछ समय अंग्रेजो ने उस स्टेट को तोड़कर उक्त जमीनों को सरहरी स्टेट एवं स्वतंत्रनाथ बनर्जी को  देखभाल के लिए दे दिया उक्त दोनों रियासतों के मालिकों ने मुख्य स्थान से मिट्टी लेकर अपने अपने जमीनों में मा का मंदिर बनवा दिया आज उसी मुख्य स्थान को बास स्थान कहा जाता है जहाँ आज भी उस लाठी से निकले बास के बगीचे मौजूद है अब उसे बीच वाला स्थान कहा जाता है जबकि स्वतंत्रनाथ द्वारा बनाये गए स्थान को बड़ा स्थान एवं सरहरी स्टेट द्वारा निर्मीत स्थान को छोटा स्थान कहा जाता है इन तीनो स्थानों पर विशाल मेला लगता है जो नवरात्रि के सप्तमी के दिन से एक सप्ताह से भी अधिक चलता है
इस मेले में गुलरिहा थाने की अस्थाई पुलिस चौकी बनाई जाती है जिसमे पुलिस के अलावा एक सेक्शन पी ए सी की भी लगाई जाती है मेले के ठेकेदार ने बताया की मेले में भक्तो के लिए शौचालय व पेयजल की ब्यवस्था करा दी गयी है और गोरक्षपीठ द्वारा कई कमरों का धर्मशाला का भी निर्माण किया गया है इस मेले में हजारों दुकानदार ,झूले वाले,मौत का कुआ व आर्केष्ट्रा वाले दर्शको के आकर्षण का केंद्र होते है
मंदिर के सेवक अवधेश सहानी बताते है कि चैत्ररामनौमी के प्रथम दिन पूजा अर्चना के लिए भक्तों की लगनी लगनी शुरु हो जाती है लेकिन नवरात्रि के बाद मेला वृहद रुप धारण कर लेता है. रविवार से भक्तों का तांता लगा रहा. भक्तो की भारी भीड़ इक्कठा होने लगी है लाखो की संख्या में भक्त आकर पूजा करते है और माता से मन्नते मांगते है

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